गंगा क्या शुध्द् करता है !

गंगा क्या शुध्द् करता है
धंदा मत कर
धरम-करम के नामपर तु
गंदा मत कर
ब्रम्ह नहीं तु आदम है
दो हाथ पैरो वाला
कपडे-लत्ते वाले तु
रंगा मत कर
भोग-मलाई खाने की
आदत तेरी बैमानी
ईमानी क्या सिख, करम
बेढंगा मत कर
शरम अगर ना आती हो तो
चूल्लु भर पाणी में
डूब मरन जा, इंसा का दिल
भंगा मत कर
गंगा क्या शुध्द करता है
धंदा मत कर
धरम-करम के नामपर तु
गंदा मत कर..!

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)