लोग

पीठ पीछे बातें, बनाते हैं लोग,
बहुत ही हंसी, उड़ाते हैं लोग,
एक बार आसमां कि बुलंदी पे क्या पहुंचे,
सर-आँखों पे फिर, यही बिठाते हैं लोग|

मत पूछो कि इनका मज़हब है क्या,
सिर्फ खुदगर्ज़ मज़हब निभाते हैं लोग,
इन्हें लगा के किनारे, गर किया तुमने कुछ भी,
सभी को ‘तुम हो पागल’ बताते हैं लोग|

अगर है जीना, तुम्हे खुद के दम पर,
भुलाके इन्हें, आओ अपनी खुद पर,
इनका क्या है, कोई और सही,
हर वक़्त नया निशाना बनाते हैं लोग|

2 Comments

  1. डॉ. रविपाल भारशंकर डॉ. रविपाल भारशंकर 25/10/2014
    • जितेन्द्र जितेन्द्र 27/10/2014

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