सुस्त से हो क्यूँ पड़े

सुस्त से हो क्यूँ पड़े, करो आह्वान प्राण का,
तुममे है जो दबा हुआ,उस असीम ज्ञान का,
नहीं कोई पर्वत ऊँचा तुम्हारे इरादों से,
फिर क्यूँ देखना आखिर कद आसमान का।

लगा दो जोर, जितना भी है बाजुओं में तुम्हारे,
करो धराशायी रुकावट और परेशानी, जो आये आड़े,
मेरे वादा है की हो जाओगे तुम खुद भी अचंभित,
तुम्हारी कोशिश कर देगी, पार तुम्हारे अनुमान का।

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 24/10/2014
    • जितेन्द्र जितेन्द्र 24/10/2014

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