नज़्म – ये उसूल-ए-मोहब्बत…

ये उसूल-ए-मोहब्बत है ऐ दिले नादाँ
किसी को चाहो तहे-दिल से अगर
न हो हासिल उस ज़ुल्फ़ की रानाइया न सही
कटे न उसके नर्म दामन की पनाहों में शब-ओ-सहर न सही
उसके ख्वाबो में बसर होती है रात होने दो
उसके ख़यालो में सहर होती है शाम होने दो
ये लम्हे उसकी यादो की अमानत है निशानी है
ये सफ़्फ़ाक़ दर्द धड़कते दिल का अफ़साना है कहानी है
ख्वाबो को मोहब्बत का ये ऐवान काफी है
ज़िन्दगी जीने का ये सामान काफी है
उसका क्या उसने तो मुस्कुरा के देखा था तुमको
तुम्हारा क्या तुमने तो बेइंतहा मोहब्बत की है

तहे-दिल – दिल की गहराइयो से
रानाइया – खूबसूरती
शब-ओ-सहर – रात और दिन
सफ़्फ़ाक़ – निर्दयी, क्रूर
ऐवान – महल

Leave a Reply