‘मुक्तक’

‘मुक्तक’
आओ मन खुद निज जीवन में, मिल जुल कुछ ऐसा गीत सुनाएँ। भारत के बिखरे बिरवे को, गुथ-गुथ आँगन इसे सजाएँ।|

‘मुक्तक’
सारे कायनात में खास आम हो गया, महफिल में मानो कत्लेआम हो गया? मैं खोजता फिरा कनात की सड़क मगर, सारे डगर को परखा जाम हो गया।।

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  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 18/10/2014

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