दिलों को जोड़ती है कविता

दिलों को जोड़ती है कविता
दीवारे तमाम सारी तोड़ती है कविता
खो गया है आदमी दूनिया के मेले में
घर की ओर राहें मोड़ती है कविता
आसान नहीं है, शब्दो में बयां करना
शब्द को नि:शब्द से ओढ़ती है कविता
कभी बिहंसती हैं, रोती हैं, होती हैं शूर
आदम रिवाजो से लढ़ती हैं कविता
और नीरवता न हो तो बेमानी है स्याही
मंसूख़ सदा से ही पढ़ती है कविता

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर (९८९००५९५२१)