अमिबा से ह्युमन तक

तुम एक बाप की औलाद नहीं हो
तुम कुछ भी कहो
और तुम्हारी मां की गवाही नहीं चलती
अनेक दु:ख अदल आए हो तुम
अनेक दु:ख बदल आए हो तुम
अमिबा से ह्युमन तक
अनेक योनिओ से गुजर आए हो तुम
तुम तो एक जात के भी नहीं हो
तुम कौन हो, कौन हो तुम
जहाँ से आते हो, वहीं हो जाते हो गुम
न आकार, न इकार, न; न-होने का तम
पैदा होने को तैयार हरदम
तुम एक बाप की औलाद नहीं हो
तुम कुछ भी कहो
और तुम्हारी मां की गवाही नहीं चलती

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर (९८९००५९५२१)