मेला

जीवन एक मेला है
दौड़ते सब सरपट यंहा
न जाने किस खोज मैं
देते सब एक दूजे को ठेला है !!

ढूढ़ते है दर बदर किसी अपने को
बीत जाती है उम्र आजकल में
पा कर भी सब कुछ यंहा
हर कोई दिखता अकेला है !!

खेल खेल में गुजर जाती है उम्र तमाम
मगर कटते नहीं कुछ लम्हे इंतज़ार के
खोया खोया हर कोई यंहा पर
फिर भी भीड़ का रेला है !!

कमी नहीं यंहा लोगो के हुज्जूम है
पता नही एक दूजे से दूर या पास है
खोये है हम यंहा सैकड़ो की भीड़ में
जाने क्यों फिर भी हर कोई अकेला है !!

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 18/10/2014
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/10/2014

Leave a Reply