ओ घघरी

ओ घघरी, मनघट की तु प्यासी, पनघट चल री सखी

झर झर बहता झरना कितना, प्यारा लगे तुझे ओ घघरी
दूर से मिलने तुझसे आए, यारा तेरा तुझे ओ घघरी

ओ घघरी, मनघट की तु प्यासी, पनघट चल री सखी

सोच रहीं हूँ मन का मेरे, मित मिले इन राहों पर
देसी हो या हो परदेसी, ना हो दिल का सौदागर
नेक हो बंदा जैसे चंदा, क्या सोच रहीं हैं ओ घघरी

ओ घघरी, मनघट की तु प्यासी, पनघट चल री सखी

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)