कण प्राप्त नहीं किसी को

जीवन-संध्या की बोल का कष्ट
पीर तीर का वस्त्र किया धारण
फंसे हुए हैं प्रत्येक नीच-श्रेष्ठ
दूर नहीं कोई किसी भी कारण

वेदना! तू भेंद न मन को
बढ़कर तेरी समुद्र से गहराई
स्थिति बदल, त्याग तन को
अनमोल जग में क्यूँ आई?

चल पड़ी वायु-गति के संग
अटल करते हुए अपनी कला
उत्साह सहित, भर कर उमंग
विघटित हुई न तेरी माला

कृपा तेरी सीखा भूतकाल को
स्मरण किया जीवन के कर्म
कण प्राप्त नहीं किसी को
विकार हो जबतक हृदय न नर्म

– नीरज सारंग

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