मेरे भारत का भार उठा ले

मैं अपने देश सहित भूला हुआ
अज्ञानी हवाओं संग मग्न झूलता
हे ईशवर! अपने संविधान के ज्ञान
हेतु कृपया देश को अब शिष्य बना
प्रत्येक का तू ही बन जा समाधान

मेरे भारत का भार उठा ले
भावनाओं में केवल करुणा बरसा दे
पाप की उन्नति से आत्मा मिलती
संपूर्ण देश को डूबा निर्मलता में
आत्मा प्रतिक्षण विद्रोह में जलती

जीवन-मार्ग की काली धूल को
मिटा, क्षमा कर प्रत्येक भूल को
प्रत्येक हृदय में जन्मा आडंबर
तहस-नहस कर दे उसके शूल को
निर्माण कर हेतु देश अपना अम्बर

तेरे ही द्वारा रचित ये संसार
प्रतिदिन करता तेरा ही व्यापार
तिमिर के किनारे पर ही भटक रहा
उस पार हेतु अब संकेत दे द्वार
तेरा गृह जिस ओर छिपा हुआ

– नीरज सारंग