मृत्यु का यह कैसा असर?

रक्त की सरिता बह रही थी
प्रतिक्षण कट रहे थे सिर
विकराल मुँह खोल रहा था
मृत्यु का यह कैसा असर?

विजय किसकी निर्णय ज्ञात नहीं
गूँज “मारो अन्यथा विजय नहीं”
हस्ति हॅय गिनती में थे नहीं
प्राणीयों की भीड़ पहले कभी नहीं
वीर ध्वंस हुए कोमल वसुंधरा पर
मृत्यु का यह कैसा असर?

एक दिशा से विरोधी का वार
शमशीर से स्वतः का भी प्रहार
“तुम वीर हो लड़ने आया हूँ रण”
तन से भिन्न उसका देशभक्त प्राण
“हे वीर! हो जाओ तुम अमर”
मृत्यु का यह कैसा असर?

ज्वाला जन की जननी-भू पर आयी
रणभूमि में विलुप्त प्रत्येक परछाई
मानवता हेतु युद्ध के अंत में
घृणा उभरी प्रत्येक के हृदय में
आलोक नम्र होता गया निरंतर
मृत्यु का यह कैसा असर?

पक्षी के पर धरा पर विचरते
लहू के रंग अम्बर में दिखते
शोक मातम में संध्या नाचती
सुर नहीं किन्तु जिह्वा हकलाती
बूंद सजते गये नयनों पर
मृत्यु का यह कैसा असर?

श्वास शोक में बह रही थी
प्रायः सभी कर रहे थे प्रण
सूर्य से साक्षी बोल रहा था
भविष्य में नहीं होगा रण

– नीरज सारंग

लिखा गया 13 वर्ष की आयु में

4 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 18/10/2014
  2. Vimal Kumar Shukla Vimal Kumar Shukla 18/10/2014
  3. Neeraj Sarang Neeraj Sarang 22/10/2014
  4. sandeep kumar vind 10/12/2014

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