अंजान अगन है तु

अंजान अगन हैं तु, अंजाम तपन हूँ मैं
तेरी यादों के बादल घने घने, धुआं धुआं मन है

जाने ना तु मेरे दिल में, तेरी हस्ती क्या है
तेरे मेरे दरमियान एक, छोटी सी सजा क्या है
दो लफ़्ज एक मुस्कान हैं, जैसे जान पहिचान है
दिलों जान तेरी बस्ती में, पहिचान कैसी उलझन है

जाने जां तु मेरे दिल में, युँ ही बेवजह है
तेरा मेरा रिश्ता जैसे, सिने में कलेजा है
दो जिस्म एक जान है, जैसे जान परवान है
दिलों जान तेरी मस्ती में, निर्वाण जैसी सुलझन है

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)