अाँगन खुदखुद धात्री आयो-2′

अाँगन खुदखुद धात्री आयो-2′
धरनी खुद-खुद कह्यो भरमायो,अाँगन खुद वह मेरो आयो। गरज्यो गर्जन भरत सा तेरा,साधो काहें आज पुकार्यो॥ मानव मन જ્ઞાन न જ્ઞાनी हो,जीवन कंटक सारा हमारो। साधु संत ॠषि साथ नहीं तो,व्यर्थ जीवन हमारा तुम्हारो॥ काष्ठ की नैया चली तलैया,दैव-दैव- दिग- दिक् पुकार्यो। मंगल मगन मन-भावन मौसम,साधो काहें आज पुकार्यो॥ गरज्यो गर्जन भरत सा तेरा,साधो काहें आज पुकार्यो। धरनी खुद-खुद कह्यो भरमायो,अाँगन खुद वह मेरो आयो॥

खुद दे दो दुर्वासा दूर्वा द्रव्य,करनी-धरनी-घरनी सहारा। म्हार इष्ट इत वास-सुवास,जन-मन धन्य वेग योग सारा॥ मै मन को मोहन मा छाड़्यो,जीवन जगमग ज्योति उजाला। अद्य अन्तस्तल अदम्य अपना हो,खुद खुद हिय खिलाहमारा॥ गरज्यो गर्जन भरत सा तेरा,साधो काहें आज पुकार्यो। धरनी खुद-खुद कह्यो भरमायो,अाँगन खुद वह मेरो आयो॥
:-छाड्यो-छोड़ो। अद्य-आज। अन्तस्तल-अंत:करण,हृदयकमल। अदम्य-विजई,प्रभावशाली। म्हार-हमारा।

2 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal 07/06/2015
  2. Sukhmangal Singh sukhmangal 27/06/2015

Leave a Reply