मेरा प्रथमांकन-5

1-
यही थे वो लोग जो
हँसते मुस्कुराया करते थे,
मेरे साथ
गुनगुनाया करते थे,
आज इन चेहरों पर
मातम् है
कभी बहारे-गुल
खिला करते थे।
भला इस वक्त का
क्या करूँ मैं
वक्त ने न साथ
छोड़ दिया होता,
जब बनी थी बात
न पूंछिए-
कुत्ते भी उठकर
सलाम किया करते थे।

2-
बड़े चाव से विवाह रचाया
कि इस उम्र जवां लगूं,
अट्ठारह की
ले आया दुल्हन कि
पचास में
पच्चीस का लगूं,
उसने दिल लगा लिया
एक लड़के से जवां,
अब बुढ़ापे में
दीवाना न लगूं तो
क्या लगूं?

3-
कली मुस्कुराती है
कलाकारी ये कुदरत की,
खिले हैं फूल सहरा में
लालाकारी कुदरत की,
मकां जो हमको देता है
उसी पर कब्जा क़ौम का,
बाबर तेरे जुर्म पर
हाहाकारी कुदरत की।

4-
इश्क की इतनी भी
गारतगरी ठीक नहीं,
तू आ जाए बज्म
कह दूँ तबीयत ठीक नहीं,
एक तमन्ना है मुलाकात की
गर हाँ कहे,
तुझे रखूं इस घर
दरो-दीवार ठीक नहीं।

5-
नब्ज उस गुलिस्तां की
पहचान ली मैंने,
किसी के इश्क में
इश्क की जान ली मैंने,
बिगड़ी पे दागे-पलंग
छुपता नहीं यारो,
अपनी ही चश्म को
कमान ली मैंने।

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