मेरा प्रथमांकन-4

1-
मालूम कि न तुझे
नेक शिक्षा मिली है,
इसलिए जरा तू
हटकर चली है,
सजा निज आँगन
गुलिस्तां कोई,
जिन्दगी ये आखिर
किसकी भली है?

2-
वैश्या मैं नहीं
न मेरा जमीर है वैश्या,
शरीर है वैश्या
न तकदीर है वैश्या,
रहना मुनासिब नहीं
बिन रिश्ते समाज में,
घ्रणित हालात से
मजबूर है वैश्या।

3-
गर वो कहें मुस्कुराकर
दवा दो मेरे पाँव,
मैं ये समझूंगा जन्नत में
यही होता है यारब,
जिसे मालूम न हो जुबां
चलने की इश्क में मटककर,
कमरदर्द वाले का अक्सर
ये हाल होता है यारब।

4-
चाँद मेरी रात्रि का
तकिए को निहारकर,
ख्वाब में तन्हा दिखा
चाँदनी उतारकर,
फिर सुबह खामोश था
रात्रि में सबाब पर,
मैं और मेरे चाँद की
हस्ती टिकी चाँद पर।

5-
इश्क ने दिल पर
दस्तक क्या दी,
जर्रा-जर्रा खड़ा था
मुहब्बत में उनकी,
मन पशोपेश में रहा
अब क्या करूँ?
तब तक उभर आई
तस्वीर उनकी।

Leave a Reply