मेरी चाहत

तू प्यार है मेरा मुझे अब कोई गम नहीं,
समेटे तेरी चाह को और चाह एकदम नहीं।
खिलखिलाती हँसी में जो, प्यार है दबा हुआ,
साथ तेरा अब मुझे, किसी स्वर्ग से कम नहीं।।

सोचता हूँ मैं कभी, मुझे तुझपे कितना नाज़ है,
हीर में हीरा मिला, कोई तो मुझमें राज है।
पूछ लूँ अगर कभी, तुझे हमसे कितना प्यार है,
सोच कर बताना तुम, मेरे कैसे कर्मोंकाज है।।

शीतल मधुर है सोच तेरी, मधुर शब्दों की तू धनी,
सभी रसों से तू भरी, तू नई आकांशाओं से तनी।
शिखर जैसा विश्वास तेरा, भाव तेरे है कोमल-2,
मेरी सीमा तुझ तक सीमित, तू मेरी हार और जीत बनी।।

अरुण जी अग्रवाल

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