कहती है दुनिया

कहती है दुनिया, ऐसे चला जा
कहती है दुनिया वैसे चला जा

ये समझती है, हमको फिकर नहीं है
मेहनत में कम हैं, आवारा हम है
इनकी शिकायत, पढते नहीं है
पैसा इज्जत, नाम शोहरत
रस्ते पे पडी है, उठाते नहीं है

चाहते हैं सभी ये, कर दे हम पूरे
इनके अधूरे, अरमां सारे
हम पे चलाये, ऐसे हुकुमत
जैसे किस्मत, इनकी लुगाई
मंज़िल हमारी, इनकी बनाई
नज़र में इनकी, हमें चाहत नहीं है

जानते हैं सभी ये, बेकार हम है
रिश्वत की दुनिया के, शिकार हम है
जेब से कडके, काम को तडपे
किंमत हमारी, दुनिया न जाने
घर पर भी मिलते हैं, हर रोज ताने
वक्त हमें ये, मंजूर नहीं है

हर एक ठोकर से दुनिया, तु हमें आजमा ले
तेरे जवाबो में हम भी, बनकर दिखाएंगे शोले
बनके अंगारे, बनके सितारे
कहेंगे दुनियां को, देख नज़ारे
माँ तेरी उल्फत, तेरी नसीहत
बनाकर मंजिल, हम चलेंगे

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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