गज़ल- मगरूर हो गए हैं

मगरूर हो गए हैं, नशे में चूर हो गए हैं
इंसान होकर इन्सानियत से दूर हो गए हैं

अस्मते माँ -बहनो की, जाती है क्यूँ इसकदर
सवालिया निशान सब पे, बिलकुल हो गए हैं

है किसका जिम्मा कौन है, पुकारता वतन
भेडिए बेछूट, बर्बाद बेकसूर हो गए हैं

मैं नहीं ये मानता, मैं जिंदा हुँ करके आज
आँसू नहीं हैं आँख में, ये कैसे नूर हो गए हैं

बोती नहीं हुकूमते, चैनो अमन के गुल
सेंकते हैं रोटियां, वे मशगूल हो गए हैं

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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