गज़ल- अजीब इत्तेफाक है

तु मेरी जिंदगी का, अजीब इत्तेफाक है
तेरे बिना जिंदगी, यारा जैसे खाक है

वक्त के किसी ताल पर, मैं नही ठहरा कभी
फिर भी मेरे गाल पर, अश्क तेरा पाक है

जिस्म के जंजाल से, अच्छा हुआ मैं दूर हुँ
जब कभी तन्हा हुआ, देखती तेरी आँख है

प्यार में व्यापार में, मैं नहीं किसी काम का
पर तेरे दरबार में, अब भी मेरी साख है

दे दिया तेरा तुझे, दर्द भी चुकता किया
फिर भी मेरे पास में, बची क्यूँ ये राख है

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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