गज़ल- भारत, भारत में गैर रखना

सच को सच और, झूठ को झूठ, जानता
इंसान वो जो शब्द और, निश:ब्द दोनो जानता
जिंदगी ये कौनसी, जो जिए जाए मरे
इंसान वो जो जिंदगी और, मौत दोनो जानता

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
मजहब तो नहीं है, कहाँ से खैर रखना   
              
हिंदी हैं हम वतन है, हिंदोस्तां हमारा बाकी बे-वतन हैं, उनका भी शैर रखना

भारत एक राष्ट्र नहीं है, वास्तव में असल में
भारत तो धृतराष्ट्र बना है, जाती में जैर रखना

कुछ है जो अभीतक, जिवित बचे रहे हम
आती है हमको नय्या, भवसागर में तैर रखना
       
यूँ ही नहीं जो हमने, सबकुछ पकड लिया है
सिखो तो हमसे दुनियाँ वालों, जुबान पे नैर रखना

परछाई के जैसे भारत, पिछे सरक रहा है
हिंदुस्तान आगे; भारत, भारत में गैर रखना

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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