प्रेम

प्रेम नहीं ढोता ज्ञान का बाेझ
प्रेम नहीं करता व्यर्थ की खोज

प्रेम नहीं उतारता पाखंड की आरती
प्रेम नहीं होता पागल और स्वार्थी

प्रेम तो है बस क्षण में उमला बोध
प्रेम से ही उगता है, जहाँ में सूरज नया रोज

प्रेम ही जीवन है, कोई और नहीं दूजा
प्रेम जीसने जाना वो जीते जी बुझा

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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