मुखड़ा या चाँद का टुकड़ा

मुखड़ा कहु या चाँद का टुकड़ा चेहरा तेरा
ताज भी शर्माता है देख हुस्न नायब तेरा
चाँद भी छुपजाता बादलो में देख हुस्न तेरा
कही भूल से हो जाए बेनकाब ये मुखड़ा तेरा II १ II

सुर्ख अधर देखूँ या देखूँ पंखुड़िया खिले गुलाब की
भ्रमजाल में उलझे भंवरे,देख लाली तेरे कपोल की
दहकता है रवि पाकर तपिश तेरे शोले से बदन की
सम्भाल रखना कही खो न जाए चमक इस नूर की II २ II

बिखेरी जुल्फे है ये तुमने या साँझ ढली है
कोई मूरत जैसे नकाब में लिपटी खड़ी है
मयूर सी चाल पे तेरी फिर चटकी कलि है
न कर बेपर्दा जिस्म को ये दुनिया बेदर्द बड़ी है II ३ II

ये आँखे है या कोई झील, जो देखे डूब जाना चाहे
समझकर जाम तेरे अश्को को सिद्दत से पी जाये
पी जो एकदा इन आँखों से वो मयखाने क्या पाये
न समेट सकोगी ये मोती जो एक बार बिखर जाये II ४ II

ये सितारे है आसमाँ के जो झड़ते है तेरे लबो से
एक एक लफ्ज लगे जैसे खिलते फूल चमन से
तू जहां में अलग है जैसे खिलता कमल कीचड से
हो जाता हूँ बेहोश बार-२,जब देखूँ जाग तुझे होश से II ५ II

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