स्त्री-मुक्ति

व्यर्थ तेरी इबादत, व्यर्थ तेरी भक्ति
बरबाद हो रही है, सारी तेरी शक्ति
शिक्षा से ही होगा, तेरा कायाकल्प
शिक्षा से ही होगी, स्त्री तेरी मुक्ति

शिक्षा की अतल गहराई में, गोता लगा रही हूँ
मुक्ति का मैं अपने, पता लगा रही हूँ

मैं नारी दबाई कुचली
तल नीचा मैं तल से निचली
मेरी चिता में राख जली
और झूठी मेरी अरथी निकली
भस्मसात डर मेरा, दुनियाँ वालों बता रही हूँ
मुक्ति का मैं अपने, पता लगा रही हूँ

आज मिला मैं अवसर जी लूं
वर्तमान मैं सारा पी लूं
भूत भविष्य को आग लगाकर
आसमान मैं सारा सी लूं
आज अकल और कल है नकल,
ये मैं जता रही हूँ
मुक्ति का मैं अपने पता लगा रही हूँ

तन तरकारी मन के भिखारी
भेद नर-नारी जीवन बेजा
बोल उठेंगे इस धरती पर
इंसा नाम हिंसा का दूजा
जो क्षर ना हो वो अक्षर, उर्जा मैं जगा रही हूँ
मुक्ति का मैं अपने पता लगा रही हूँ

रचनाकार/कवि~ डॉ. रविपाल भारशंकर (९८९००५९५२१)

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