वसुंधरा जैसी परी की है तू जननी

दक्षिण-सागर में है मयूरों की सभ्यता
उनके नीले पंखों ने सागर को रंगा
पंख-किलकारियों से सिन्धु-पवन आयी
मुझे भी ले चल, जिधर तू गाते चली
तू पर से उत्पन्न धरा की सेविका
तेरी यात्रा का अंतिम पड़ाव है कहाँ?
न अकांक्षा तो छोरतक न ले चल मुझे
जीवन तक संग गाने का अवसर दे
तू तो बढ़ रही है हिमगिरि की ओर
मुझे भी ले चल, निमंत्रण भेंट कर
रथ का रंगहीन प्रकाश न प्रतीत होता
मुकुट माथे का भी न आभास होता
तू कोई मन मुग्ध स्वर्गीय परी नहीं
वसुंधरा जैसी परी की है तू जननी
मेरे हृदय-स्वरों का कोष जो सूखा था
स्वत: खिलकर रथ के नीचे बिछ गया
प्राण-पुष्‍प पर रथ को चलाते ले जा
या अपने रथ-छाँव में प्राण बाँधते जा
मुझे भी ले चल, तरसने हेतु न छोड़
हृदय-अभिलाषाओं के टुकड़े को न तोड़
मेरे प्राणों से मेरे तन का भार हटा
बोझ के सहारे तो मैं स्वयं में ही भूला
हिमगिरि की ओर बढ़ने की भावना से
अंग-कण-कण नृत्य हो उठा अभी से

– नीरज सारंग

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