प्रेम कविता

इसी मोसम का केहना हे,
तु मुझको याद करती हे।
मेरे मेहबुब तु मुझसे, दिले फरियाद करती हे।
ना मुझको धुंड इस भीड में,
मे तुझसे मिल ना पाऊंगा।
मेरे कातील वफा कर ले, मे अब ना लोट आऊंगा॥

याद कर वो जमाना था,
जब मे फरियाद करता था।
समुंदर पीर था दिल मे, छुप के दिदार करता था।
लहु लोहा कीया मुझको,
जब भी में मिलने आया था।
तेरे हर लफ्ज ने ए कातील दिल पे खंजर चलाया था॥

अब नही दिल मेरा जिंदा,
ना जिंदा मेरी सांसे हे।
मेरा ये इश्क़ तो अब बस, घडी भर कि दो बाते हे।
ना लगाना दिल मेरे दिल से,
मेरा दिल एक कहनी हे।
ना नम कर अपनी आंखो को, तेरे नीशा चुमती जवानी हे॥

‌ – संदीप वि. जगताप.

Leave a Reply