भारतमाता

वो खिल रही थी फूल सी, नज़र किसी की लग गई।
दिन-दहाड़े एक दिन, अस्मत उसकी लुट गई।।

तब़ीयत से खराब़ वो, कोशिश जीने की कर रही।
हर एक बूँद अपमान की, गले में उसके फँस रही ।

मैंने पूछा एक दिन, जी कर क्या करोगी तुम।
बोझ में दबे हुए, मर-2 कर यूँ जीओगी तुम।।

कहने लगी वो मुझे, मैं अकेली हूँ नहीं।
सभी अस्मत लुट रही, मैं अनोखी हूँ नहीं।।

हार गई अगर मैं जो, वो मजबूत होते जाएंगे।
मैं टूटती जाऊंगी और वो उठते जाएंगे।।

मैं डरी आतंक से तो, आतंकी घर में ही घुस जाएंगे।
कुछ कठोर नहीं हुई तो, घरवाले भी आतंक मचाएंगे।।

कसम ये मैंने ठानी है, बदल दूँगी सब एक दिन।
एक से अनेक होंगे, हम सभी जन एक दिन।।

फिर दरिंदों का कभी, हाथ उठ न पाएगा।
जो उठेगा वो गिरेगा, हाथ उठते ही उखड़ जाएगा।।

तुम भी मेरे भाई बंधू, अपने मार्ग को प्रशस्त करो।
हो कहीं पर डर तनिक, हौंसला उसका पस्त करो।।

तुम मेरे हो वीर पुत्र, मैं तेरी गौरव गाथा हूँ।
हे भरतवंशी उठो अब, मैं ही तो भारतमाता हूँ।।

अरुण जी अग्रवाल

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