तोड़ के हर बंधन

जब तोड़ के हर बंधन
दुनियाँ छोड़ जाऊंगा
ये बादा है मेरा
एक बार तेरी भी
आँखें नम कर जाऊँगा
गीले शिकवे तो बाद में
हर बात याद आएगी
जब क़तरा – क़तरा गुजरते
हर लम्हे में सांस थमती जायेगी
याद आएँगी वो मेरी खामोश निगाहें
पलकों के बीच बना तुम्हारा आशियाना
वो दिलों तक जाती
कभी लवों पर ना आती
मेरी खामोश दीवानगी
कोई याद करे न करे
बादा है के मेरे जाने पर तेरे
बेवफा दिल से भी
एक आह सी निकल जाएगी
चुप रहे जो हम
वो हमारे जज़बात थे
तुमने जो कही
वो तुम्हारे ख़यालात थे
चल नहीं पाये तुम साथ
तो कोई बात न थी
हम हमेशा अकेले ही रहे
ये सकूँ है दिल को बंधू”
वर्ना रुखसत जमाने से हो जाऊं
हँसते – हँसते
ऐसी मेरी औकात कहाँ…………………………….
देशबन्धु (टी. जी. टी. आर्ट्स) हिमाचल शिक्षा विभाग
सर्वाधिकार सुरक्षित

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 13/10/2014
  2. डी. के. निवातिया D K NIVAATIYAN 13/10/2014

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