।।रास्ता।। (कविता)

*रास्ता*

चलते-चलते
प्रेमपथों पर
रुक जाता हूँ
असमंजस के कारण
क्योंकि तस्वीरें वे आती रहती आहट बनकर यादों की
और निराशा
देकर झांसा
बगदाती हैं मेरे मन को ।।
स्नेहो मे पागलपन को ।।1।।

उलझ गया हूं
एक पथिक सा
और रास्ते भरे हुये हैं
दुबिधाओ से कठिनाई से
और अकेले तन्हा तन्हा भीग रहा हूँ मायूसी मे
जब जब चलता
बहुत अखरता
तकलीफें होती हैं तन को ।।
स्नेहो मे पागलपन को ।।2।।

बहुत हो चुका
मुझसे धोखा
अब मै तुमसे दूर रहूँगा
दर्द भरा या सुखद रास्ता
चलना तो हैं आज नहीं तो कल पहुचूगा देर सबेर
मै क्या करता
यदि न सहता
इस अपयश रूपी धन को ।।
स्नेहो मे पागलपन को ।। 3।।

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