।।जीवन।।(कविता)

*जीवन*

अपने जीवन की राहों पर
थका हुआ जो हारा
मिली सफलता न उसको फिर
फिरा हैं मारा मारा
अपने बस मे
असमंजस मे
कौन किसे पहचाने ।।
डाल रहा हूँ दाने ।। 1।।

***

ताकि संका न हो मन मे
बनी रहे कुछ आशा
और उजाले के चक्कर मे
अंधकार हैं खासा
अपने जीते
जो भयभीते
बने रहे अंजाने ।।
डाल रहा हूँ दाने ।। 2।।

***

मै ही बना सिकारी खुद का
मै ही बना सिकार
और हॄदय को दे प्रलोभन
किया मधुर ब्यवहार
जीवन शैली
झूठी थैली
पग पग पर खिसियाने
डाल रहा हूँ दाने ।।3।।

***

न जाने क्या अन्तिम मंजिल
कैसा हैं इतिहास
सच्चाई को ढूंढ न पाया
किया बिफल प्रयास
लौट न पाया
बस पछताया
चला जो पता लगाने ।
डाल रहा हूँ दाने ।।4।।

***

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 13/10/2014
  2. राम केश मिश्र राम केश मिश्र 22/10/2014

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