गजल

जब भी दिल ने चाहा बुला दिया उसको
खुद तो बुझ गए पर जला दिया उसको

प्यास लगी तो लगाई सीने में दबाकर
तृप्त होने पर वहीँ भुला दिया उसको

कभी बनाकर अंगूठी लगाई उंगली पर
चाहत हुई बाला की तो गला दिया उसको

कोरे कागज की तरह थी अभी तक कोरी
तमाशा बनाकर रंगो में मिला दिया उसको

चहचाहने बाली चिड़िया ज़िंदा लाश बनी रही
शर्वते अनार कह के पिला दिया उसको

हरि पौडेल
नेदरल्याण्ड
२७-०९-२०१४

2 Comments

  1. Sandeep Jagtap Sandeep Jagtap 12/10/2014
  2. Paudel Paudel 12/10/2014

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