इंतजार में जिस खुदा के

1-‘
इंतजार में जिस खुदा के
बैठा रहा इमाम,
क्या मालूम था उसी
दर से उठना पड़ेगा?

2-
बुझा दूँ गर लगी हो आग
तेरी महफिल में,
दिल्लगी दिल से मगर
मंजूर कहाँ मुझको?

3-
था जिक्र कत्ल का ओ
सजा खंजर-आजमां को,
या इलाही,कब उठेगा पर्दा
हकीकत से बता?

4-
भला गर इश्क से होवे
आशिक क्यों रहे तन्हा,
मुनाफा इस हकीकत में
हर दिल दाँव लगाता है।

5-
देख बला के हुस्न को
मैंने कहा न कुछ,
लेकिन निगाहें देखकर
देखती ही रह गईं।

6-
क्या पता वो हुस्न की
बेज़ा किताब हो,
पढ़कर जिसे मैं बेवफ़ा
दीवाना हो गया।

7-
दुआ फिर बद्दुआ बनके
गले से आ लगी मेरे,
उठाकर ले गया जब मैं
अपनी चारपाई को।

8-
फिर वही थीं उँगलियाँ
फिर वही मंजर,
चोट तबले पर मगर
जोर से पड़ती।

9-
महफिल तुम्हारी में हमें
क्या मिला आखिर,
हमने अपना वजूद ही
खोकर रख दिया।

10-
इश्क क्या चीज
ये दिल गवांकर जाना,
कहा शौक में मजनूं
हकीकत अब नजर आई।

11-
जी सकोगे छोड़कर
हमको कभी न तुम,
वो तो हमारे इश्क का
पैमाना छलक गया।

12-
हर मजा अपना अलग
इश्क का अपना मजा,
रंगे-हुस्न देख हुईं
बस्तियां तमाम।

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