तक़ल्लुफ़ कर जरा मुस्कान

हमें ग़म में ना जीने दो ,
हमें कम भी ना जीने दो ।
थोड़ा तो पास का अहसास ,
हमें भी तो करने दो ॥

तक़ल्लुफ़ कर जरा मुस्कान ,
अधरों पर तो आने दे ।
कुछ पल के लिए ही,
मेरे तन में जान आने दो ॥

कोई रात की रानी है कहता ,
कोई दिन में अधखुली गुलाब ।
हजारों शोधकर्ता खोजते सुंदरता का राज़ ,
क्या कहूँ ,कैसे कहूँ ,तुम हो मेरी जिंदगी की आगाज़ ॥
VIVEK VIRENDRA PATHAK