हाथों में उलझी लकीरें

हम दीवारो -दर ही जोड़ते रहे
जिंदगी कतरा -कतरा बिखरती गयी
हाथों में उलझी लकीरें
बंद दरवाजों में धकेलती रही
पत्थर बन गए जज़्वात
आग अंदर ही अंदर सुलगती रही
खामोश हैं ,हैं तनहा हैं
भीड़ चारों तरफ हंसती रही
देख कर हालत गैरों की
अंदाजा न लगा सके
हालत तेरी भी एक न एक दिन
ऐसी ही होने को रही
कौन मिटा हैं कब किस पर
जिद तेरी ही खुद को मिटाने की रही
देख दुनिया के अंदाज नए
जान अपनो से रिश्ते नए
क्या ? अब हेकड़ी तेरे अंदाज की रही
मंजर था उजड़ा- उजड़ा
फिजा भी खामोश थी
जिद तेरी ही “बंधू”
नया जहाँ आबाद करने की रही………..१
देशबन्धु “टी.जी. टी. (आर्ट्स) हिमाचल शिक्षा विभाग
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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