माना कि तुमने इश्क को

1-‘
माना कि तुमने इश्क को
रस्म की खातिर,
मंजिलों तक ख्वाब का
साकार भी होना।

2-
क्या नहीं मालूम मुझे
उनकी नई तकरीर,
वो खुदा के नाम पे
नीलाम कर देंगे।

3-
देखने से कम हुआ
कब नशा शराब में,
तब भला इस हुस्न पे
किसलिए ताला?

4-
सुनकर तेरी आवाज
मुझको लगा कि हाँ,
कुहकती हो छत मेरी
मोरनी कोई।

5-
कभी जाइए उस बज्म
और देखिए कि
दिखाते हैं क्या-क्या,
या बेवजह चर्चा हो रहा है
सितमगर का यूँ ही।

6-
खुदा ही गर खुदा होता
नहीं गर इश्क की बातें,
हकीकत फिर कहाँ
लिखता कोई
अपनी तबाही की।

7-
चलो फिर बात करते हैं
उसी से इश्क की बातें,
कि मंजिल आशिकी की
फिर बनी है कारवाँ अपना।

8-
जुबां से कुछ कहाँ निकला
निगाहें इस तरह बरसीं,
बरसने को जिस तरह बादल
बेताब होते हों।

9-
मेरी आह मेरे लव से
गर लगे भी निकलने,
बोसा ले और रंग दे
नजाकत से मुझको।

10-
जिस हसीं के नाम पे
हुए बहुत बदनाम,
उसको हमारी मूंछ से
नफरत हो गई।

11-
करके उनसे इश्क हम
करें गुजारा रात,
ताज्जुब उनकी हर अदा
आबाद कर गई।

12-
लगें हम क्यों लगें कहने
खरीदो दाम दे करके,
इश्क की मकतब नहीं ये
बिकती यहाँ शराब।

शब्दार्थ-
1-मकतब/पाठशाला

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