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मुझे लिख रही है एक डरी हुई कविता
जो महाजन के क्रुर पंजियों सी गिर रही है ।
मैं एक मनुष्य हूँ कविता के हाथों
लिखे जाने से इन्कार करता हुआ मनुष्य
जैसे इस समय में कविता होने से
इन्कार करती हुई कविता
वेद होने से इन्कार करता हुआ वेद ।
जैसे मुझमें एक प्रधानमंत्री हो
प्रधानमंत्री होने से इन्कार करता हुआ ।
पत्तियों को खा रहा है सूरज
समय के इस उल्टे संश्लेषण में
और एक कविता आमादा है
कि वह एक मनुष्य लिखेगी
वैसा मनुष्य जैसा वह देखेगी ।
अध्यापक होने से इन्कार करता
हुआ अध्यापक
दलाल होने से इन्कार करता हुआ दलाल
वकील होने से इन्कार करता हुआ वकील
कवि होने से इन्कार करता हुआ कवि ।
कविता मनुष्य को लिखेगी
जूते के घिसे हुए तले सा लिखेगी
बचे रहने का संघर्ष करते पेङ सा नहीं लिखेगी ।
कविता लिखेगी मनुष्य को एक फटे हुए
कलेजे वाला मनुष्य
जिसमें चलनी सा झरता है
ईर्ष्या और प्यार और उसकी मनुष्यता भी ।
कविता लिखेगी कि मनुष्यों से बेहतर तो
कलेजे हैं मछलियों के ।
सुग्गे की जुबान वाले भी जो मनुष्य हैं
जिन्होंने मुझसे पहले लिखी कविताएँ
उन कविताओं में शब्द एक मॄत्यु है
कोई पढता नहीं, कोई सुनता नहीं
सुग्गे के मुँह से मॄत्यु गिर रही है तारीखों पर
कविताएँ इन्कार कर रही हैं कविता होने से ।
इसीलिए कविता ने तय किया कि वह लिखेगी
मनुष्य
और अपनी रचना की तलाश में गयी
दसों दिशायें ,तीनों लोक
नभ ,जल,थल कविता ने तलाशा अपनी रचना
बङी शिद्दत से ।
मंगल के अक्ष के ठीक दो इंच ऊपर तक
गई कविता
वह यान भी मनुष्य रहित ।
उसे अपनी रचना मिली उन विवरों में
उपनिषद में पढ़े गए विवरों में
स्मॄतियों में लिखे गए विवरों में
वैसे विवर जो उत्तर काशी के पार
हिमालय की गुफाओं में नहीं
पर जिनके बारे में यह लिखा था
कभी मनुष्य नहीं रहे यहाँ
ऋषि नहीं रहे यहाँ
देवता भी नहीं
ये साँपों के विवर ये भेङियों के विवर
कविताओं ने जिन्हें मनुष्य लिखना था
उन्हें मनुष्य वेदों के विरुद्ध
उपनिषद और स्मॄतियों के विरूद्ध
मिले उन्हीं विवरों में
जिनमें साँपों को रहना था ।
कविता ने कहा हाँ तुम दिखते हो मनुष्यों जैसे
मैंने तय किया है कि मैं तुम्हें लिखूंगी
मैंने मनुष्य होने से इन्कार कर दिया ।

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