गर्म के मारे

।।गर्म के मारे।।

ये दिल घायल हो गया जब गर्म के मारे ।।
तरबतर तब हो गया मै शर्म के मारे ।।1।।

हद हो गयी जब मैंने अपना शर्ट निकाला ।।
हैरान हैं सब लोग अपने मर्म के मारे ।।2।।

पानी पानी हो गया हर बूंद टपकने लगी ।।
तब धूप शर्माने लगी निज कर्म के मारे ।।3।।

हर शाँप मे देखा, हर हर ढाबे मे ढूंढा ।।
फिर भी प्यास अधूरी रही इक टर्म के मारे ।।4।।

ऐसा न कहो ये भी इबादत है खुदा की ।
इसे तो करना ही होगा निजधर्म के मारे॥5।।

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