जब एक ‘टेलर’ बना पार्षद

(1 )

आधी ‘उम्र’ चीथड़ों को गूंथने में काड़ दी,
आधी में ‘वरिष्ठ पार्षदी’ हाथ आई है।
छोड़ि देगों लोक-लाज अवना करों लिहाज़,
‘भेड़िया’ के घर आज खुद भेड़ आई है II

(2 )

भाई बोले आई भेड़ कडि नहीं जाय भाई,
तासों पहलें आप जाकी टाँगें तोड़ी दीजिये।
हम-तुम मिलिजाएँ आपस में बाँट खाएँ,
जनता से मोह भंग आज करि दीजिये II

(3)

पिता बोला पुत्र जिनि टांग में गमाओं रात,
सबसे पहलें तात जाको पेट फाड़ दीजिये।
सारी उम्र दूसरों की चाकरी में काटी मैंने,
पुत्र का फ़र्ज आज अदा करि दीजिये II

(4)

माई बोली पेट फाड़ो तो जि मिमियाएगी,
नाहक मोहल्ले की नीद उड़ि जाएगी।
फिर न बनेगो काम बेजाँ होंगे बदनाम,
तासों पहले लाल जाको मूड काटि लीजिये II

(5)
करि कै हलाल फिर बैठि खाउ माल-माल,
घर को ‘अकाल’ लाल आज मेंटि दीजिये।
गंग की कसम सारी ज़िन्दगी रही में तंग,
आज अंग-अंग में उमंग भरि दीजिये II

(6)

नारि बोली प्राणनाथ जनता है तेरे साथ,
‘पद’ पाय ‘जनादेश’ को न ठुकराइये।
अवसर मिला है तात रब की है सौगात,
हिय के कपाट खोल पीय को बुलाईये II

(7)

माता-पिता,भाई-बन्धु,पुत्र, नारि मोह जाल,
इनके लिए न आदिनाथ को गमाइये।
मुझे पूछो तो मैं कहूँ इतिहास बने आप,
मेरे प्राणनाथ जगन्नाथ बनि जाईये II

(8)

सीता जैसी नारि मिली आज के ज़माने मैं,
मुझे राज-पाठ छोड़ वन को पठाती है।
न मै संत न महंत नाहीं मैं इंसान हूँ,
मुझे आदमखोर से आदमी बनाती है II

जगमोहन श्रीवास्तव

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