प्रार्थना

(1)

हे! दया सिन्धु ऐसी, दया कीजियेगा !

मिले बुद्धि,साहस वो, बल दीजियेगा !!

नहीं चाहता हूँ मैं, धनवान बनना !

मगर चाहता हूँ मैं, गुणवान बनना !!

मै झोली पसारे, खड़ा तेरे द्वारे !

प्रभु मुझको इंसा, बना दीजियेगा !!

हे ! दया सिन्धु …….

(2)

मैं दीनों के आंसू में, खुद को डुवा दूँ !

मैं पर हित में अपनी, पलकें विछादूं !!

मैं गम को समेटे, रहूँ अंक में !

प्रभु ! इतना आँचल, बड़ा कीजियेगा !!

हे ! दया सिन्धु …….

(3)

ईमान ज़िन्दा रहे , मेरे अंदर !

करूणा दिल में , वहा दो समुंदर !!

जननीं को मुझ पर , बड़ा गर्व हो !

प्रभु ऐसा उपकार, कर दीजियेगा !!

हे ! दया सिन्धु …….

(4)

न मंदिर में जाऊँ, न मस्जिद जाऊं !

न गुरूद्वारे जाकर, मैं माथा टिकाऊ !!

पर जहाँ भी दिखे, कोई इंसान मुझको !

मैं समझू कि तू है, वो मन दीजियेगा !!

हे ! दया सिन्धु …….

(5)

मेरे दिल में अभिमान, जागे कभी !

प्रभु मेरे तन को , मिटा दो तभी !!

ये संसार तेरा , तू मेरा प्रभु !

मुझे अपने चरणों की, रज दीजियेगा !!

हे ! दया सिन्धु ……
लेख़क -जगमोहन श्रीवास्तव

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