आज की ‘नारी’

आज की ‘नारी’

आज की नारी विराट भई, अब घूँघट में नहीं रूप समाबे I
आधे खुले ‘कुच’ आधे पै चोली, अंग उघारि चले न लजाबे II

पर ‘नर’ देखि के आह भरे,तब तिरिया मन में ख़ुशी मनाबे I
छेड़ीदयी तो भई मन की ,संग शखियों को हर्षाय सुनाबे II

एडी मरोरि के चाल -चले, और नैन की सेन शयन बुलाबे I
माया के मोह ऐसी फ़सी ,निज ‘काया’ को वो ब्यापार बताबे II

नारी गिरी तो समाज गिरा, गिरते समाज को कौन उठाबे I
जगमोहन अनुमानि कहें,एसी ‘नारी’ की कोख़ से राम नआबे II

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