मेरा खत किसी के नाम

मैं तेरी राह का पथिक हूं जब से
तूने मुझे देखा भी नहीं था तब से
करता अगर विनती मैं रब्ब से
तो शायद छीन लेता तुझे सब से
इशारा मिला तेरा तो आया मैं नभ से
बहुत सहमा सा रहा हूं तेरे सबब से
तूने मुझे अपने इशारो पे बहुत दौडाया
बहुत कमाया बहुत गमाया भी बहुत रिश्ते नाते
बहुत यार बनाये बहुत ऊचाँ मकाम भी पाया
मगर अफसोस कुछ भी साथ न लेजा पाया
मैने आखिर खुद को एकदम वीरान पाया
क्यों मेरे साथ किसी को नहीं भिजवाया
जब तक सफर वहां तक खत्म न हो जाता
बहुत सी गपे लडाता तेरी इतनी सी बेवफाई का राज बताता वो दुख जताता फिर …फिर मेरे साथ वहां तक जाता
जहाँ पहुंचकर तेरा मोह भी है छूट जाता