कुछ हिस्से ऐसे भी

कह तो दूँ पर कैसे, दिल में अहंकार बैठा भी है।
उससे चाहत भी है, उससे दिल ऐंठा भी है।।
सलामती की दुआ निकलती है खातिर उसके,
वो दिल में घर करके बैठा भी है।।

उसे चाहता नहीं सताना, फिर भी तंग कर ही देता हूँ।
उससे मिलने खातिर मैं, दिल में रंग भर ही देता हूँ।।
वो खिलाफ नहीं पड़े ही खिलाफत करता हो,
उसके लिए मैं दिल की सफाई कर ही देता हूँ।।

यूँ एक रोज की तरह, मुझे वो याद आता है।
दिल के किसी कोने में, पड़ा-पड़ा मुस्कराता है।।
यकीनन वो तवज्जो दिया करता था मुझे,
तभी तो तन्हाई में वो चेहरा मुझे याद आता है।।

वो कहता कुछ भी हो, पर मन में उसके कुछ और ही है।
चुप होगा अपने होंठों से वो, लेकिन उसकी सदा कहीं और ही है।।
हम बात-बात पर झगड़ पड़ते हैं अक्सर, लेकिन हमारा प्यार कुछ और ही है।
तकलीफ़ देकर खुद ही लेते हैं दर्द, ये तरीका प्यार का कुछ और ही है।।

म़ासूमियत तेरी मेरे ऊपर तो, भारी पड़ जाती है।
जब तेरी याद दिल के, कोठे चढ़ जाती है।।
तेरे सामने तुझसे, प्यार में डर सा लगता है।
तुझसे दूर तेरे प्यार की, खुमारी बढ़ जाती है।।

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