कँटीला जीवन

क्या करूँ आज मैं तनहा जैसा क्या कहूँ कि हूँ ख़ामोश भी
वक्त बहता जा रहा मैं वहीं पड़ा हूँ आज भी

अलगाव मेरा होने को आतुर, नित निर्दयी होता जाता हूँ
पथ में हैं पाषाण जो निष्ठुर,उन सम ठोक लगाता हूँ

दौर क्षणिक ये निश्चित जानूँ, मति मेरी भ्रमित कुपित
कील, कटार, करिपाण स्नेही, मंद विवेक है चिंतित व्यथित

कोई दे दो वक्त की बूंदे, एकदम मैं तो प्यासा हूँ
धड़कन थी जब चंचल-2, अब मरित्यु की परिभाषा हूँ

जीवन जीओ जीने जैसा, क्या विरक्त , व्याकुल विकलांग बनें
खाना सोना सोके खाना, निर्बल असहाय बलवान बने

मैं याद न आऊँ ध्यान रहे, अधिकार ये देकर जाता हूँ
मानव न था मैं जब तक जीया, बिन मानव ही मर जाता हूँ

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