मैं कवि नहीं कोई

मैं कवि नहीं कोई
फिर भी मेरे काल्पनिक गीत तो कोई सुनो
भले ही लिखावट में गहरी भावनाएँ नहीं
बिखरे हुए स्वर-मात्राओं को ही सजा दो

मेरे हृदय में गीतों के अंकुर फूटते जा रहे
और लिखने हेतु मुझे विवशता में खींच रहे
आलोक-हवा में झूमने हेतु भी वो तरस रहे
गीतों की सिंचाई हेतु करूणा-वारि-धारा बहे
मेरे गीत-कलश में प्रेम परिपूर्ण रूप से भरे
इन्हें अपने सुख प्राप्ति में चुनो तो कभी कोई
मैं कवि नहीं कोई

अभि तो केवल एक अबोध पौधा ही उगा है
हिय में अगणित गीतों का सागर भी डूबा है
हर गीत-कलि को मैंने मधुर स्नेह से रंगा है
लेकिन ये नवजात् गीत अभी तो अंधा ही है
बाह्य वातावरण में कभी भ्रमण नहीं किया है
संसार की रूप रेखा में इसे उतरने दो कोई
मैं कवि नहीं कोई

अन्य प्राणियों के अज्ञात विचारों से भय में है
सुनहरे गीत को झुकना पङ जाए , शंका में है
जो गीत उर के पंखुङि-आँचल में लिपटा है
किसी अहंकारी प्राणी के गौरव में नष्ट होना है
यौवन से पूर्व ही ध्वँस धुँवे में भी हो सकता है
इन शिशु गीतों को उभरकर खिलने दो कोई
मैं कवि नहीं कोई

भले ही कोमल कल्पना का सभी विरोध करें
आत्मीय ईश्वर बिन सुने ही आनंदित हो उठे
टूटे स्वर भी गर्व से उसके आसन तले बिछते
कलि के अपूर्ण गीत-पुष्प भी बिखरते जाते
गाने से पूर्व ही मेरे अंग सिहर काँप ऊठते
शेष गीतों को भी अनुभव से चुन लेता वहीं
मैं कवि नहीं कोई

मेरा अश्रुजल भी कभी अपमानित नहीं होता
तू स्वतः मेरे वक्ष में अथाह भावनाएँ भरता
अश्रुजल से मेरा हृदय स्नान कर धन्य होता
मेरा प्राण तटहीन प्रसन्नता आकाश में तैरता
तेरे शरण में आते भले गीत-वन निर्माण होता
हे नाथ! तू है महाकवि, मैं तेरा श्रोता भी नहीं
मैं कवि नहीं कोई

– नीरज सारंग