रफ़्तार !!!

रफ़्तार !!!

हां ये रफ़्तार
कितनी प्रबल
गतिशील
वायु वेग की प्रतिद्वंदी
सलिल समाहित
गगन को छूती
धरा को चूमती
अपनों को
पीछे धकेलती
क़त्ल रिश्तो का
बंधनो का त्याग
संस्कार विहीन
विचलित
दिशाविहीन
चलती जा रही
आज के दौर में
मूल्यरहित
कब हाथ से
छूट जाती है
ये जिंदगी
बस एयर बस
दौड़ती जाती,
चलती जाती
बढ़ती जाती
अंतविहीन
ये “रफ़्तार” है
या कुछ और
पता नही !!!

::: डी. के. निवातियाँ :::

2 Comments

  1. mani mani 29/07/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/07/2016

Leave a Reply