संदेही सरि की मँझधार में हो जाती

हिय-वीणा पर बज रहे कीर्तन भजन आरती
संदेही सरि की मँझधार में हो जाती
मेरे सुर की तरणी-दिशा में
विकार की सुध होने लगती
तेरे मधुर मुग्ध मधु मंजरी के चारों ओर
न जाने कितने भँवरे उन्माद लिये भ्रमण करते
मन-अभिप्राय है अपने स्नेह सौरभ सागर में
तू डूबा केवल मुझे
दंभी मन रूठकर देवालय-वातावरण त्याग
बैठ जाता कोने
अतः अंतःवीणा के सभी राग
टूट-टूट कर बिखर जाते
प्रेम की रागिनियों से भरी मेरी नौका डूब जाती
रूठे प्राण तृप्त न हो पाते
सद् विकार हो! हे सुमन-हिय-कोष में आसन ग्राही!
कृतार्थ वालों में अंतिम ही बना ले

– नीरज सारंग

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