‘जरा सम्भल कदम कर डालें’

जो भी देखा उड़ा गगन में,शरण में आकर सभी पड़े है।
चरण पादुका का रज लेकर,उठकर देखो वही उड़े हैं॥
उड़ने के भी विधि बहुतेरे, काँटे में कुछ आके फंसे हैं।
नदी और तालाब में गिरकर,गंगाजल कुछतो गिर पिये हैं॥
आओ हम सब मुहिम चलायें,साथ साथमिल जुल उड़ जाएं।
चरण शरण उनके आ जाएँ,पग-पग के कांटे को मिटायें॥
मौसम भी कुछ ऐसा आया,बन कर भी वह खड़ा तना है।
तने में छिपा लाल निशान,लाल लाल लोल ललित ललाम॥
लड़-लड़ लाखों गये सिधार, अपना – अपना दे गये विचार।
आओ हम भी दो हाथ करें,कल जग में चढ़- बढ़ साथ करें॥
वह सोचें कि सब सपना जो आए कयामत सब अपना हैं।
खुली होली हो राज करें,आओ दिल की कुछ बात करें॥
दुर्गंध!૬ दोनो हाथ बढ़ेंगे,मिल जुल सबकुछ साफ करेंगे?
जरा सम्भल कदम कर डालें,डगर इ काँटे निखिल पड़े हैं॥

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