अनुभव

अनुभव

देखो जननी !
जीत लाया
मैं जीत लाया
एक सलौना
मीत लाया
गाण्डीव प्रत्यंचा से
मत्स्य चक्षु खींच लाया |

बधाई ! पुत्र बधाई !
उन्मन कुंती हर्षाई
शिकार या पुरस्कार ?
बने पञ्च-प्रसाद
निर्भेद , एकसार |
झट गांडीव छूट गया
धनुर्धर धैर्य टूट गया |

दुहाई ! माते दुहाई !
‘द्रुपद-सुता’ चिल्लाई
क्या ना शील भंग होगा
पांच का जब संग होगा
और ! कौन ? कहाँ ? कब ?
कैसे होगा सब ?

धैर्य धरो ! धैर्य धरो !
निज मंतव्य
ना गगन करो
हे नवोढ़ा ! मत चीखो
कुंती अनुभव
तुम भी सीखो |
मैं पारंगत
हर तरकीब सिखा दूंगी
कब,कहाँ, कौन, कैसे
सब समझा दूंगी |
और हाँ …
जग से ..?
जग से क्या डरना
जो
नर – भावों का झरना
जहाँ –
अपुरुष भी
यदि ठान ले
तो
मुकुट – मद में
कई पत्नियाँ टांग ले
जहाँ
पुरुष – लम्पटता
महिमा आख्यान हो
और
नारी अस्मिता
पैर की जूती
जुए का सामान हो |