आज तुम-हम मिले थे

आज तुम-हम मिले थे, निशि के मन्द आलोक में
जब चाँदनी समीर संग लोरी गा रही थी
सूने पङे हृदय-वाद्ययंत्र पर तेरे कोमल स्पर्श से
सहसा मधुर सुर में रागिनी बज उठी
मन में पङा पुर्वजन्म का भी गहन तिमिर
रूठ न जाने कहीं छिप गया
हिय के मूक विहंग सर्वदिशा में चहक उठे थे
नेत्र-नीर ने तेरे चरण-सरोज को छू लिया
दंभी संदेही रक्त अंग के कण कण में विहरा
वास्तविक पावन दर्शन हुए ?
कर में तूने स्नेह-समुद्र का रेत जो भेंट दिया
आज तुम-हम मिले थे

– नीरज सारंग

शब्दार्थ –

प्रभु! तुम और मैं आज मिले थे रात के
मद्धम प्रकाश में जब चांदनी ह्वाओं के साथ
लोरी गा रही थी और तेरे धीरे से ही छूते
मेरे सुने पड़े हृदय के वाद्ययंत्र पर मीठे स्वरों में
अचानक संगीत बजने लगा । मेरे मन में पड़ा
पिछले जन्म का भी जो गहरा अंधकार भरा था,
वो मुझसे रूठकर न जाने कहीं छिप गया ।
हृदय के गूंगे पक्षी सभी दिशायों में
चहकने लगे और मैने अपने आँखों के
पानी से तेरे चरण के कमल को धो दिया ।
लेकिन मेरा घमंडी और संदेही खून
यहीं सोचता रहा, क्या सच में ही
तेरे पवित्र दर्शन हुए थे? तो हाँ प्रभु!
तुमने मेरे हाथों मे प्रेम के समुद्र का
बालू जो उपहार दिया ।
तुम और मैं आज मिले थे ।