विषधर

साँप केंचुल छोङ चुका है
और जोड़े में है
मौसम से विदा होने को है बरसात ।
हलवाहे श्रम की थकान मिटा रहे हैं
गा कर बची रह गई है
कजरी अभी गुनगुनाहट में ।
हरियाली से फूल उठा है खेत
पॄथ्वी के गर्भिणी होने के संकेत
दो कोस दूर महल जैसे घर में
ट्रैक्टरों की ट्रालियाँ
धो-पोंछ रहा है बिचौलिया ।
अढातिए गोदामों की सफाई
शुरू करवा चुके हैं
जनसेवा का टिकट कटवा कर
घर लौट रहे हैं रघु चा ।
प्यार से पार कर रहे
मोहल्ले से घर का रास्ता ।
चाँद के सिरकंडे से
यही सुन्दर पनहारिन
झाङती है गाँव की गलियां
मन ही मन फिदा होते हैं
माटी के रंग के दुपट्टे पर ।
बंदूकों की गोलियों के धमाके
फसल पकने की प्रतीक्षा में
साँझ अभी गिरी है
छप्परों से पूँछकट्टी बिछौतियाँ
इन्हीं हरी झाङियों में कहीं
आबादी बढ़ाने का जरूरी
व्यापार पूरा कर
एक दूसरे की देहों से
पलट रहे होंगे विषधर
चूहे बिल बना चुके हैं अंतिम बार ।

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